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जीवन कौशल शिक्षा ‘उमंग’

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“क्योंकि मैं अध्यापक हूँ”

गर्व करूँ अपने कर्मों पर,
क्योंकि मैं अध्यापक हूँ।
कोरे मन पर चित्र बनाता,
बच्चों का मैं पालक हूँ।।
शेखर सा जीवन जीने को,
इनको मैं सिखलाता हूँ।
जीवन सफल बनाने को मैं,
इनको ज्ञान प्रदाता हूँ।।
मन वाणी का मैं निर्माता,
सद्गुण अंश प्रसार करूँ।
गौरवगाथा इन्हें सुनाकर,
ओजस का संचार करूँ।।
सत्य की राहों पर चलने को,
इनको दीप दिखाता हूँ।
ज्ञान कला साहित्य संस्कृति 
इनको मैं सिखलाता हूँ।।
योग ध्यान करने को प्रेरित
कर शक्ति उपजाता हूँ।
विज्ञानी बनने का मारग
इनका मैं खुलवाता हूँ।।
विपदाओं से भी लड़ने को,
‘शक्ति’ नित्य जगाता हूँ।
विश्वगुरू भारत बन जाए,
यही भाव सिखलाता हूँ।।
जीवन को देता उजियारा,
तम अज्ञान का नाशक हूँ।
गर्व करूँ अपने कर्मों पर,
क्योंकि मैं अध्यापक हूँ।।

रचनाकार - शक्ति पटेल,

बचपन विपदा झेल रहा~

खेल रही थी कांटो पर वो,
माता थी भू खोद रही ।
पिता कुदाली लिए हाथ में,
नियति हाथ में गोद रही ।।
नन्हीं सी वो जान थी परबस,
ठण्ड में सिकुड़न फैली थी ।
जिस पर सोई थी वह बच्ची,
वह चादर भी मैली थी ।।
आँखों के ऊपर था काँटा,
जिसको नयन निहारे हैं ।
हे परमेश्वर क्या हालत देखो,
कैसे कष्ट तुम्हारे हैं ।।
हाथ फावड़ा था परिजन के,
श्रम सीकर की धार घनी ।
राह किनारे बिस्तर कैसा,
लोहे की थी तार बनी ।।
पतला सा था उदर अनोखा,
भूख की व्यथा सुनाता था ।
आँखों में थी अश्रुधारा,
जल वह बहता जाता था ।।
दृश्य मांद के तट का है यह,
दूरभाष नित फ़ैल रहा ।
जनजीवन को सुलभ बनाने,
बचपन विपदा झेल रहा ।।
करो जतन आगे सब आओ,
बचपन को मत मारो यूं ।
पढ़ो पढ़ाओ खूब बढ़ाओ,
बचपन को अब तारो यूं ।।
~ शक्ति

सुन कलाकार !

सुन कलाकार !
जब भी होगा 
तुझसे कोई सृजन।
जब भी होगा
कला का स्पंदन।
साथ होगी तानों,
उलाहनों की भी चुभन।
कहीं निकलेंगे शब्द, 
तीर से ऐसे, 
जैसे चाहें वे 
धराशायी करना तुझे।
कहीं कोई कहे निर्मम,
जिसे ना कोई मतलब किसी से,
कोई कहे सनकी, मतवाला,
जो खोया रहता है अपने में ।
पर ना होना उदास,
ना करना अधूरी आस।
कुछ ही दूर रहता है लक्ष्य,
मन में हो अगर विश्वास।
ना करना गम,
ना करना मन को निर्मम।
कला तो पौत्री परमात्मा की।
फिर क्यों  इतना उच्छवास ?
क्यों हारता तेरा मन?
मत हो उदास ।
मिलेगी ‘शक्ति’ राह।
जो तू चाहे 
रचता चल, रचता चल।

- शक्ति